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Wednesday, 19 December 2018

आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जीवनी


भारत देश के आजादी में अनेक लोगो ने अपने खून को न्योछावर कर दिया कुछ लोग अंग्रेज की गोलियो का शिकार हुए तो कुछ लोग भारत को आजाद कराने के लिए हसते हसते फांसी के फंदे पर झूल गये शायद लोगो को अपने देश के आजादी के प्रति ऐसी दीवानगी थी जो अपने भारत देश को हर हाल में अंग्रेजो के चंगुल से आजाद कराना चाहते है
उन्ही वीर सपूतो में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का भी नाम आता है जिनके साहस और अदम्य हौसलों के कारण अंग्रेज भी अपने दातो तले ऊँगली दबा लेते थे जब द्वितीय विश्व युद्द के दौरान पूरा विश्व युद्ध की आग में जल रहा था तब भारत देश के लोग अपनी आजादी के लिए संघर्षरत थे तब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ऐसी स्थिति मे अंग्रेजो से लोहा लेने के लिए अपनी सेना आजाद हिन्द फ़ौज के साथ जापन के साथ खड़े थे तो अंग्रेज डर के मारे सुभाष चन्द्र बोस | Subash Chandra Bose की हत्या का प्रयास करने लगे थे जब सुभाष चन्द्र बोस ने “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा” का नारा दिया था तब शायद सुभाष चन्द्र बोस की इस नारा के आगे अंग्रेज भी नतमस्तक हो चुके थे और अंग्रेजो को आजादी देने पर विवश कर दिया था तो आईये जानते है आजादी के ऐसे वीर पुरुष और आजाद हिन्द के महानयक सुभाष चन्द्र बोस के जीवन के बारे में  जिनके जीवन से आज भी हर भारतीय प्रेरित होता है

सुभाष चन्द्र बोस – जीवन परिचय

नाम – सुभाष चन्द्र बोस 

जन्म तारीख – 23 जनवरी 1897
जन्म स्थान – कटक शहर (उड़ीसा)
माता का नाम – प्रभावती देवी
पिता का नाम – जानकीनाथ बोस
शिक्षा – बी.ए (आनर्स)
ख्याति – भारत के अग्रणी स्वंत्रता सेनानी
विशेष उपलब्धी – आजाद हिन्द फ़ौज के संस्थापक (सुप्रीम कमांडर)
प्रमुख नारा – “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा” और “जय हिन्द”
मृत्यु – 18 अगस्त 1945 में विमान दुर्घटना में मृत्यु (मृत्यु के पुख्ता प्रमाण न होने के कारण आज भी भारत के इतिहास के संदेह का विषय है जिसके लिए दो बार आयोग का गठन भी हो चूका है परन्तु आज भी इनके मृत्यु आज भी एक रहस्य है )

सुभाष चन्द्र बोस की जीवनी 

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था इनके पिता का नाम जानकीनाथ था जो पेशे से वकील और माता का नाम प्रभावती देवी था जानकीनाथ के कुल 14 संतान थी जिनमे सुभाष चन्द्र बोस कुल 6 बहन 8 भाई थे जिनमे सुभाष चन्द्र बोस अपने माता पिता के नौवी संतान थे सुभाष चन्द्र बोस अपने अपने शरतचन्द्र बोस से सबसे ज्यादा लगाव था


बचपन से ही मेधावी और पढने में तेज सुभाष चन्द्र बोस की आरम्भिक शिक्षा कटक में प्रोटेस्टेण्ट यूरोपियन स्कूल से हुई इंटरमीडिएट की पढाई में बीमार होने के बावजूद पूरे कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया था बचपन से ही सेना में भर्ती की इच्छा रखने वाले सुभाष चन्द्र बोस के जब इंग्लिश टीचर ने भारत के विरुद्ध टिप्पणी किया तो ऐसे में सुभाष चन्द्र बोस से रहा नही गया और अपने टीचर के खिलाफ जमकर विरोध किया फिर कॉलेज से नाम कट जाने के बाद स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश लिया
फिर 1919 में बीए की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुए और पूरे  कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान था और फिर अपने पिता के इच्छा का सम्मान करते हुए आगे की पढाई के लिए 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैण्ड गये जहा उन्होंने आईसीएस की परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया और फिर और फिर आईसीएस रहकर वे अंग्रेजो की गुलामी नही करना चाहते थे ये बात अपने भाई और माँ को बताया तो उनकी माँ गर्व से भर गयी इसके बाद सुभाषचन्द्र बोस 1921 में वापस अपने देश भारत लौट आये

आजादी के लिए सुभाषचन्द्र बोस का जीवन

सुभाषचन्द्र बोस श्री अरविन्द घोष के विचारो से बहुत ही प्रेरित थे फिर जब वे वापस भारत लौटे तो तुरंत गाँधीजी से मिलने पहुच गये और उनकी गांधीजी से पहली मुलाकात 20 जुलाई 1921 को हुई और इसी दौरान गाँधीजी के सलाह पर वे कोलकाता में दासबाबू से मिलकर असहयोग आन्दोलन में हिस्सा लिया जहा पहली बार गांधीजी ने सुभाषचन्द्र बोस को “नेताजी” कहकर पुकारा था जिसके कारण सुभाषचन्द्र बोस नेताजी के नाम से प्रसिद्द हो गये

फिर 1922 में भारतीय कांग्रेस के नेतृत्व बंगाल में स्वराज पार्टी की स्थापना की फिर कोलकाता महापालिका में भारी जित के बाद सुभाषचन्द्र बोस को महापालिका का अध्यक्ष बनाया गया जिससे सुभाषचन्द्र बोस ने अपने कार्यकाल में कोलकाता के सभी रास्तो का अंग्रेजी नाम से बदलकर भारतीय नाम दिया जिसके कारण सुभाषचन्द्र बोस की प्रसिद्धि युवाओ में बहुत तेजी से फ़ैल गयी और वे युवाओ के लिए आजादी के प्रेरणा श्रोत्र बन गये

1928 में जब साईमन कमिशन भारत लाया गया कोलकाता में सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में इसका विरोध किया गया और फिर साईमन कमिशन को जवाब देने के लिए कांग्रेस ने मोतीलाल नेहरू  के नेतृत्व में आयोग का गठन किया गया जिसमें सुभाषचन्द्र बोस भी इस आयोग के एक सदस्य थे और फिर अपनी बीमारी के चलते सुभाषचन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और इसके पश्चात फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य आजादी की लडाई में तेजी लाना था जिसके लिए लोगो के बीच जाकर सुभाषचन्द्र बोस आजादी के लिए प्रेरित करते थे

आजाद हिन्द फ़ौज का गठन

सुभाषचन्द्र बोस का मानना था की यदि दुश्मन को मारना है तो दुश्मन के दुश्मन से दोस्ती कर लेनी चाहिए इसी कड़ी में जब 21 अक्टूबर 1943 को सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज  की स्थापना किया और फिर अपने सैनिको को “जय हिन्द”, “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा” और “दिल्ली चलो” जैसे नारे दिए और इस सेना में अंग्रेजो द्वारा बंदी बनाए गये भारतीयों को भर्ती किया गया

और महिलाओ के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी जिसका मकसद आजादी के लिए भारतीय महिलाओ को भी प्रेरित करना था और द्वितीय विश्व के दौरान अंग्रेजो के खिलाफ जापानी सेना की मदद की और फिर आजाद हिन्द फ़ौज की मदद से सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेजो से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जीत लिए थे फिर इसके बाद इम्फाल और कोहिमा पर आजाद हिन्द फ़ौज ने आक्रमण किया जिसमे जापानी सेना की मदद न मिलने के कारण सुभाषचन्द्र बोस को पीछे हटना पड़ा
6 जुलाई 1944 को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण में सुभाषचन्द्र बोस ने गान्धीजी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपने भारत की आजादी के लिए कारण बताया और कांग्रेस से निकाले जाने के बावजूद सुभाषचन्द्र बोस ने पहली बार गांधीजी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया और अपनी इस आजादी के जंग की विजय के लिए आशीर्वाद भी माँगा, शायद सुभाषचन्द्र बोस के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है गांधीजी के विरोध होने के बावजूद सुभाषचन्द्र बोस ने गांधीजी का सम्मान करना नही छोड़ा

सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु

द्वितीय विश्व युद्ध में जापन की हार हो जाने के कारण सुभाषचन्द्र बोस ने अब अपनी सेना की सहायता के लिए रुस की तरह रुख किया था और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए 18 अगस्त 1945 को सुभाषचन्द्र बोस हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे और फिर अचानक इनका विमान लापता हो गया जिसके बाद फिर सुभाषचन्द्र बोस कभी भी नही दिखाई दिए अलग अलग देशो द्वारा इनकी मृत्यु की अलग अलग खबर दी गयी जो की आज भी इनके मृत्यु का रहस्य बना हुआ है और फिर इनकी मृत्यु की जाच के बनी भारतीय आयोग का भी दो बार गठन किया जिसमे कोई भी विमान दुर्घटना के सबुत न मिलने के कारण इनके मृत्यु के रहस्य पर आज भी पर्दा बना हुआ है

सुभाषचन्द्र बोस का भारतीय जनमानस पर प्रभाव 

भले ही सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य पर आज भी पर्दा बना हुआ है लेकिन लोगो के जेहन में सुभाषचन्द्र बोस का नाम आते ही लोग खुद को प्रेरित करने से रोक नही पाते है उनका दिया हुआ नारा “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा” और “जय हिन्द” मन में एक अजब तरीके से उर्जा का संचार करता है और जब भी भारत की आजादी की बात होंगी सुभाषचन्द्र बोस के सहयोग को भुलाया नही जा सकता है भले ही आज सुभाषचन्द्र बोस हमारे बीच में नही है लेकिन उनके द्वारा दिखाए गये आजादी के प्रति दीवानगी हमे हमेसा अपने देशप्रेम को बढ़ावा देगी

“जय हिन्द”

वीर सावरकर का जीवनी और उनसे से जुडी कुछ अनजान बाते

भारत के स्वंत्रता सेनानियों में विनायक दामोदर सावरकर / Vinayak Damodar Savarkar जिन्हें वीर सावरकर / Veer Savarkar के नाम से हम सब भलीभांति परिचित है  वीर सावरकर / Veer Savarkar एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक थे जब इन्होने पहली बार लेखनी चलायी तो सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजो के दमनकारी सन 1857 के स्वंत्रता संग्राम का इतना सटीक वर्णन किया की इनके पहले ही प्रकाशन से अंगेजी सत्ता दर गयी थी यहाँ तक की अंगेजो को इनके प्रकाशन पर रोक लगाना पड़ा था वीर सावरकर / Veer Savarkar एक ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया पर जब नाशिक में शोक सभा का आयोजन किया गया तो सबसे पहले इसका खुलकर विरोध वीर सावरकर / Veer Savarkar ने ही किया था और विरोध करते हुए सावरकर ने कहा था की क्या कोई अंग्रेज हमारे देश के महापुरुषों की मृत्यु पर शोक सभा करते है जब अंग्रेज हमारे देश होकर हमारे बारे में नही सोचते तो भला हमे दुश्मन की रानी की शोक सभा क्यों करनी चाहिए जिसे देखकर अंग्रेजो के हाथ पाँव फुल गये |

वीर सावरकर की जीवनी


वीर सावरकर / Veer Savarkar का जन्म 28 May 1883 को भारत के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक जिले के भांगुर गाव में हुआ था इनके पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर और माता का नाम राधाबाई था जब वीर सावरकर महज 9 साल के ही थे तो इनकी माता का हैजे की बीमारी से देहांत हो गया था और फिर माता की मृत्यु के पश्चात 7 साल बाद प्लेग जैसी भयंकर बीमारी के फैलने के कारण इनके पिता भी इस दुनिया को छोड़कर चले गये फिर इनका लालन पालन इनके बड़े भाई गणेश और नारायण दामोदर सावरकर तथा बहन नैनाबाई के देखरेख में हुआ
बचपन से वीर सावरकर / Veer Savarkar पढने लिखने में तेज थे जिसके चलते आर्थिक तंगी के बावजूद इनके भाई ने इन्हें पढने के लिए स्कूल भेजा फिर इसके पश्चात 1901 में वीर सावरकर ने शिवाजी हाईस्कूल से नासिक से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण किया बचपन से ही लिखने का शौक रखने वाले वीर सावरकर / Veer Savarkar ने अपने पढाई के दौरान कविताये भी लिखना शुरू कर दिया था.
इसके पश्चात इनका विवाह सन 1901 में ही यमुनाबाई के साथ हुआ जिसके बाद इनके आगे की पढाई का खर्च की जिम्मेदारी इनके ससुर ने उठाया जिसके बाद इन्होने पुणे के फग्रयुसन कालेज से बीए की पढाई पूरी किया और पाने इसी पढाई के दौरान वीर सावरकर / Veer Savarkar ने आजादी के लिए उस समय के युवा राजनेता बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय जैसे नेताओ से प्रेरणा मिली जो उस समय तत्कालीन बंगाल विभाजन के विरोध में ये लोग देश में स्वदेशी अभियान चला रहे थे जिनसे प्रभावित होकर वीर सावरकर ने पहली बार 1905 में दशहरा के दिन विदेशी कपड़ो की होली चलायी जो की एक तरह से पूरे देश में अंग्रेजी वस्तुओ के विरोध की आग पूरे देश में फ़ैल गयी जिसके बाद वीर सावरकर ने अपने कॉलेज मित्रो के साथ अभिनव भारत नामक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य अंग्रेजो से मुक्त नवभारत का निर्माण करना था आजादी के लड़ाई के दौरान वीर सावरकर सक्रीय रूप से अपने संघटन द्वारा आजादी के लड़ाई में भाग लेने लगे थे और जब भी वीर सावरकर लोगो को संबोधित करते हुए भाषण देते थे तो उनके भाषण में आजादी पाने के लिए उतावलापन और हिंदुत्व की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती थी जिसके कारण इनके भाषणों पर सीधा रोक तक लगा दिया गया था
वीर सावरकर अपर रुसी क्रांति का काफी अधिक प्रभाव पड़ा जिसके चलते उन्होंने लन्दन प्रवास के दौरान इंडिया हाउस / India House में पहली बार 10 मई 1907 को पहली बार भारत की प्रथम स्वंत्रता संग्राम का जश्न मनाया गया और इसी दौरान वीर सावरकर की पहली बार लाला हरदयाल से हुई जो की उस समय इंडिया हाउस का देखरेख करते थे फिर वीर सावरकर को अंग्रेजो ने अंग्रेजो के खिलाफ कार्यवाही करने पर 13 मई 1910 को पहली बार इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी फिर इसके पश्चात 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास की सजा दी गयी अपने एक ही जीवनकाल में दो दो बार आजीवन कारावास पाने पहले व्यक्ति है

स्वंत्रता प्राप्ति के पश्चात वीर सावरकर बहुत ही खुश तो हुए ही लेकिन उन्हें इस बात का बहुत दुःख भी हुआ की उनके देश के दो टुकड़े हो गये उनका मानना था की किसी भी देश की सीमाए किसी के लिख देने से निर्धारित नही होती है बल्कि देशो की सीमाए देश के नवयुवको के आपसी प्रेम और भाईचारे से निर्धारित होती है
फिर गांधीजी की हत्या के उपरांत 5 फरवरी 1948 को इन्हें प्रिवेंटिव डिटेंन्षन एक्ट धारा के तहत इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन बाद में कोर्ट की कारवाई के बाद इन्हें निर्दोष पाया गया उन्हें जेल से रिहा कर दिया
अक्सर लोगो द्वारा उनपर आरोप लगाया जाता रहा की वीर सावरकर हमेसा भड़काऊ भाषण देते है लेकिन वीर सावरकर स्वराज की कामना के साथ अंतिम समय तक लोगो को हिंदुत्व और आपसी एकता के भाईचारे में जोड़ना नही छोड़े फिर 82 वर्ष की उम्र में 26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर हमेसा के लिए इस दुनिया से विदा हो गये

वीर सावरकर से जुडी कुछ अनसुनी बाते

वीर सावरकर को अपने जीवन के तमाम अवसर जेल की काल कोठरियों में बिताना पड़ा लेकिन अपने अदम्य साहस के बलबूते वीर सावरकर हमेसा इन सजाओ से परे होकर विजयी निकलते, वीर सावरकर के जीवन से कुछ ऐसी ही तमाम अनसुनी बाते है जिन्हें हम आईये आज जानते है

1 – वीर सावरकर विश्व के पहले ऐसे क्रन्तिकारी देशभक्त थे जिनसे अंग्रेजी शासन इस तरह हिल गयी थी की इन्हें एक बार नही दो दो बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी फिर भी सजा के डर से परे वीर सावरकर तो हसते हुए कहते थे चलो अच्छा है की हिंदुत्व के पुनर्जन्म से इतना डर गयी है की मुझे दो दो बार आजीवन कारावास की सजा मिली है
2 – वीर सावरकर अंग्रेजी शासन के दौरान जब उन्हें काला पानी की सजा मिली थी लगभग जेल में 10 साल गुजारते हुए भी प्रतिदिन खुद कोल्हू चलाते थे और अपनी लेखनी को धर देते हुए जेल की दीवारों पर 6000 से अधिक कविताये लिखी थी जिन्हें उन्हें मुजबानी भी याद था
3 – वीर सावरकर एक ऐसे राष्ट्रभक्त नेता थे जिनको अंग्रेजो ने लगभग 30 साल तक जेल की कोठरियों में कैद कर रखा था यहाँ तक आजादी के पश्चात भी नेहरु सरकार ने भी गांधीजी की हत्या का आरोपी मानकर इन्हें लाल किले में कैद कर दिया गया था लेकिन आरोप न सिद्ध न होने की दशा में इन्हें ससम्मान रिहा कर दिया गया था

4 – वीर सावरकर ने पहली बार अंग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करते हुए विदेशी वस्त्रो की होली जलाई थी जिसके चलते इनके ऊपर केस चलाया गया और फिर इन्हें कालेज से निकाल भी दिया गया था जिसके विरोध में अनेक हड़ताले भी हुई जो अंग्रेजी शासन के लिए नासूर साबित हुआ बाद में गांधीजी भी इनसे प्रभावित होकर 16 वर्षो के पश्चात 1921 में विदेशी वस्त्रो का बहिस्कार किया
5 – वीर सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर अंग्रेजी शासन को हिला दिया था अंग्रेज शासन वीर सावरकर से इतने भयभीत हो गये थे की आखिर वीर सावरकर को इतनी सटीक जानकारी कहा से मिली थी जिसके चलते ब्रिटिश शासन ने इनके पुस्तक को प्रकाशित होने से पहले ही बैन कर दिया था लेकिन भारत में भगत सिंह के अथक प्रयासों से इसे छापा गया था जो हर देशभक्त के घर में यह पुस्तक छपे के दौरान जरुर मिलता था

6 – वीर सावरकर बंदी बनाये जाने के दौरान जब अंग्रेज इन्हें इंग्लैंड से भारत ला रहे थे तो 8 जुलाई 1910 को ये चुपके से समुन्द्र में कूद गये और तैरते हुए वे फ़्रांस पहुच गये थे
7 – वीर सावरकर से अक्सर कांग्रेस शासन इनकी प्रखर और हिंदुत्व की राष्ट्रवादी सोच हमेसा खफा रहती थी जिसके चलते इन्हें आजादी के बाद भी इन्हें जेल में कई सालो तक गुजरना पड़ा था यहाँ तक की इनकी मृत्यु के उपरांत भी जब संसद में शोक प्रस्ताव रखा गया था कई सांसदों ने इनके विरोध में आते हुए साफ़ मना कर दिया था की जब वीर सावरकर संसद के सदस्य थे ही नही तो उनके लिए संसद में क्यू शोक प्रस्ताव रखा जाय
8 – वीर सावरकर की मृत्यु के पश्चात पहली बार 2003 में संसद में इनकी मूर्ति का अनावरण हुआ जिसके विरोध में विपक्षी पार्टियों ने खूब जमकर हंगामा भी किया था यहाँ तक की इनकी मूर्ति को लगने से रोकने के लिए राष्ट्रपति तक को ज्ञापन भेजा गया था लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम इस सुझाव को नकारते हुए खुद अपने कर कमलो से वीर सावरकर के मूर्ति का अनवारण किया था

भले ही आज वीर सावरकर लोगो के बीच में नही है लेकिन उनकी प्रखर राष्ट्रवादी सोच हमेसा लोगो के दिलो में जिन्दा रहेगी ऐसे भारत के वीर सपूत वीर सावरकर को हम सभी भारतीयों को हमेसा नाज रहेगा . इसी कारण हर साल 28 मई को पूरे देश में वीर सावरकर के सम्मान में वीर सावरकर जयंती / Veer Savarkar Jayanti मनाया जाता है ऐसे वीर सपूत भारत माँ के लाल वीर सावरकर को हम सभी की तरफ से नमन …..

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

Chandra Shekhar Azad | चन्द्रशेखर आजाद आजादी के परवानो में एक ऐसा नाम जिसके नाम में ही आजाद शब्द जुड़ा हुआ हो उसकी जीवन शैली की आप कल्पना सहज ही कर सकते है और वो “आजाद” शब्द चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad ने खुद से अपने नाम में जोड़ लिया था यानी वे खुद को अंग्रेजो की गुलामी से आजाद घोषित कर चुके थे, और उन्होंने अपना सारा जीवन को भारत माँ की आजादी के लिए लगा दिया था चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad तो भारत माँ के इतने बड़े देशभक्त थे की उन्हें अपनी भारत माँ की आजादी के अलावा और कोई बात सूझता ही नही था,
भले ही आज के समय में हम सभी के बीच चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad नही है लेकिन उनकी तस्वीरों में मुछो पर ताव देते हुए चन्द्रशेखर आजाद जरुर कही न कही लोगो के मन में जोश पैदा करता है तो आईये भारत माँ के इस अमर लाल चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad की जीवन से जुडी बातो को को जानते है

चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी पर निबन्ध

नाम – चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad

जन्मतिथि – 23 July 1906
जन्मस्थान – भाबरा गाँव (वर्तमान में चन्द्र्शेखर आज़ादनगर)  मध्य प्रदेश 
माता – जगरानी देवी 
पिता – पंडित सीताराम तिवारी 
प्रमुख कार्य – भारतीय स्वंत्रता आन्दोलन के प्रमुख क्रन्तिकारी, हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के प्रमुख सेनापति 
मृत्यु – 27 फ़रवरी 1931 ( चंद्रशेखर आजाद पार्क, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश)
चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad का जन्म 23 जुलाई 1906 को भारत देश के मध्यप्रदेश राज्य के अलीराजपुर जिले के भावरा नामक गाव में हुआ था इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था जन्म के समय में ही इनके ललाट पर चन्द्रमाँ जैसी अद्भुत चमक थी जिसके कारण इनका नाम चन्द्रशेखर रखा लेकिन चन्द्रशेखर शारीरिक रूप से काफी कमजोर थे
लेकिन बचपन से ही वे बहुत ही निर्भीक बालक थे एक बार पटाखे जलाते समय एक साथ सारी तीलिया जलाने लगे जिसके कारण एक झटके में आग लगने के कारण इनका हाथ भी जल गया लेकिन उन्होंने उफ्फ तक नही किया और बड़े ही शांत भाव से मलहम पट्टी कराया बचपन में ही भील बालको के साथ रहने के कारण इन्होने धनुष तीर चलाना सीख लिया था इस प्रकार वे निशानेबाजी बचपन में ही सीख लिए थे
chandrashekhar azad
चूकी घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इनकी पढाई लिखाई अच्छे से नही हो पायी लेकिन इनको गाव के बुजुर्ग व्यक्ति मनोहरलाल त्रिवेदी से प्राथमिक पढाई का ज्ञान हुआ फिर आगे की पढाई के लिए अपनी माँ से जिद करके वे बनारस चले आये और फिर यही से चन्द्रशेखर ने आजादी के प्रति खुलकर हिस्सा लेने लगे

चंद्रशेखर का नाम आजाद कैसे पड़ा ?

बालक चन्द्रशेखर | Chandra Shekhar का नाम आजाद कैसे पड़ा यह भी चन्द्रशेखर के जीवन की बहुत ही अद्भुत घटना है जिसका जिक्र करते हुए सच्चे हिन्दुस्तानी होने का अहसास होता है

यह बात सन 1921 की है जब गांधीजी के नेतृत्त्व में असहयोग आन्दोलन शुरू किया गया पूरे देश में अंग्रेजो के खिलाफ नारेबाजी और भाषण शुरू हो गये ऐसे में चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad उस समय मात्र 15 साल के थे लेकिन वे भी अपने साथी दोस्तों के साथ हाथ में तिरंगा लिए हुए भारत माता की जय के नारे लगाते हुए पैदल मार्च करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे इतने में अंग्रेज सिपाहियों द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन फिर भी चन्द्रशेखर नारा लगाना नही छोड़े
फिर उन्हें अंग्रेज मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित किया गया लेकिन चन्द्रशेखर आजाद के चेहरे पर तनिक भी डर या भय का भाव नही था जिसे देखकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट भी चौक पड़ा था की भला यह छोटा सा बालक बिना डर के अपने देशभक्ति में डूबा हुआ है
फिर सिपाहियों ने चंद्रशेखर के नारे लगाने के बारे में बता दिया तो फिर मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर को कटघरे में खड़ा करने का आदेश दिया
फिर मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है
चन्द्रशेखर बोले – आजाद
मजिस्ट्रेट ने पूछा – पिता का नाम
चंद्रशेखर बोले – स्वाधीनता
फिर मजिस्ट्रेट ने पूछा – तुम्हारा घर कहा है
तो चंद्रशेखर ने जवाव दिया – जेल
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने पूछा – क्या करते हो
चंद्रशेखर ने कहा – भारत माँ की आजादी
फिर मजिस्ट्रेट ने कहा – तुम्हे डर नही लगता
तो चंद्रशेखर बोले – अपनी भारत माँ को आजाद कराने में डर कैसा
यह सब बाते सुनकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट चौक पड़ा और तुरंत चंद्रशेखर के इस व्यवहार को देखते हुए 15 कोड़ो की सजा सुना दी , इसके बाद अंग्रेज सिपाही चंद्रशेखर को जेल में ले गये फिर कोड़े मारते हुए गिनती शुरू की, अंग्रेज सिपाही जितने जोर से कोड़े मारते चन्द्रशेखर उतने ही ही तेज से भारत माता की जय के नारे लगाते, 15 कोड़े मार खाने के बावजूद चन्द्रशेखर उफ्फ तक नही किये और फिर अंग्रेज द्वारा उन्हें रिहा कर दिया गया इसके बाद तो चन्द्रशेखर को सभी साथी आजाद के नाम से ही पुकारने लगे

चन्द्रशेखर आजाद का क्रांतिकारी जीवन

इस घटना के बाद तो मानो चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad के जीवन का सिर्फ एक ही लक्ष्य रह गया था अपनी भारत माँ को आजाद कराना.

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी दल के सदस्य चन्द्रशेखर आजाद

Hindustan Republican Association Member Chandra Shekhar Azad

जब 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया गया तो चन्द्रशेखर आजाद बहुत ही आहत हुए और उन्होंने अपने दम पर अंग्रेजो से भारत माँ को आजाद कराने का सपना देखने लग गये इसके बाद वे अहिंसा की विचारधारा को छोड़कर राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्त्व में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी दल के सक्रीय सदस्य बन गये इस दल को चलाने के लिए इसके सदस्य अंग्रेजो के धन लुटते थे और संस्था के लिए कार्य करते थे
इसी संघ के सदस्यों द्वारा सन 1925 में ही काकोरी कांड हुआ था और फिर लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्याकांड में भी चन्द्रशेखर आजाद सक्रीय रूप से शामिल हुए थे,
इसके बाद चन्द्रशेखर आजाद ने आजादी के लिए अपना केंद्र झाँसी के ओरक्षा जंगलो में अपना ठिकाना बनाया, यही से वे अंग्रेजो के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होते थे और इन्ही जंगलो में अपने साथी सदस्यों को बंदूक चलाने का प्रशिक्षण भी देते थे इसके बाद तो चंद्रशेखर मानने लगे थे की आजादी अकेले दम पर नही पाया जा सकता है
इसके बाद तो उन्होंने अपनी विचारधारा के साथ भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, सचिन सान्याल बटुकेश्वर दत्त जैसे अनेक लोगो के सम्पर्क में आये और फिर अपने सभी साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी सरकार को निशाना बनाने लगे थे जिसके कारण चन्द्रशेखर आजाद | Chandra Shekhar Azad को तो जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का भी ऐलान हो चूका था
चन्द्रशेखर आजाद को आजादी पाने के प्रति ऐसा जूनून सवार था की उन्हें आजादी के अलावा और कोई बात पसंद ही नही आती है एक बार की बात है चन्द्रशेखर आजाद अपने साथी मित्रो भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त के साथ इलाहाबाद में ठहरे हुए थे की एक दिन कही से सुखदेव एक कैलेंडर ले आये जिसपर सिने तारिका की तस्वीर छपी हुई थी उन्होंने घर की दिवार पर उस कैलेंडर को टांग दिया और फिर कही चले गये इसके बाद चन्द्रशेखर आजाद जब रूम में आये तो उस कैलेंडर को देखा वे बहुत ही आग बबूला हुए
और तुरंत उस कैलेंडर को फाड़ कर जमीन पर फेक दिया इतने में सुखदेव जब वापस आये तो देखा की कैलेंडर दिवार पर न रहकर जमीन पर टुकडो के रूप में इधर उधर पड़ा हुआ है तो सुखदेव ने पूछा की यह किसने फाड़ा है तो चन्द्रशेखर आजाद तुरंत बोल पड़े हमने कैलेंडर फाड़ा है तो गुस्सा शांत करते हुए सुखदेव ने कहा की इस कैलेंडर में तस्वीर तो काफी अच्छी थी
तो चन्द्रशेखर आजाद बोले तस्वीर अच्छी थी इसलिए तो फाड़ा की कही हम लोगो का ध्यान अपनी भारत माँ की आजादी से भटककर कही इस सिने तारिका पर न चले जाए. इसलिए हमे इन सब कामो को छोड़कर अपनी देश की आजादी पर लगाना चाहिए

चन्द्रशेखर आजाद का अमर बलिदान मृत्यु 

चन्द्रशेखर आजाद अपने देश के आजादी के प्रति इतने पक्के थे और अक्सर बोलते थे की मै तो आजाद हु कभी भी जीते जी अंग्रेजो के हाथ नही आऊंगा और आ भी गया तो वह जिन्दगी का मेरा आखिरी पल होंगा.

और यह बात फरवरी 1931 की है जब चन्द्रशेखर आजाद इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरु से मिलने के लिए भेजा गया लेकिन जैसे ही चन्द्रशेखर आजाद आनंद भवन गये तब जवाहरलाल नेहरु उनसे बात करने तक को इंकार कर दिया इस घटना से चन्द्रशेखर आजाद काफी क्रोधित हुए और फिर अपने साथियों के साथ अल्फ्रेड पार्क में आकर बैठ गये
यह बात 27 फरवरी 1931 की है जैसे ही अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आजाद अपने साथियों के साथ किसी बेंच पर बैठे हुए थे किसी मुखविर ने चन्द्रशेखर आजाद ने अंग्रेजो से पार्क में होने की बात पुष्टि कर दी थी फिर क्या था अंग्रेज सिपाहियों ने उनके साथियों सहित चारो तरफ से घेर लिया था लेकिन चन्द्रशेखर आजाद ने इस स्थिति में भी अपनी हिम्मत का परिचय देते हुए अंग्रेजो पर गोलिया चलानी शुरू कर दिया था इसके बाद उन्होंने उस स्थान से सुखदेव को किसी तरह भगा दिया और खुद अंग्रेजो का सामना करने लगे,
चूकी चन्द्रशेखर आजाद अंग्रेजो से चारो तरफ घिर चुके थे और उन्हें लगने लगा था की अब वे अंग्रेजो का सामना भी नही कर पायेगे क्यूकी उनके पिस्तौल में सिर्फ एक ही गोली बची थी तो उन्होंने अपने खुद से किये वादे के मुताबिक जीते जी अंग्रेजो के हाथ न आने के लिए खुद को आखिरी गोली से उड़ा लिया और इस तरह भारत माँ का लाल भारत माँ के गोद में गिर पड़ा था और खुद को भारत माँ की आजादी के लिए प्राणों का न्योछावर कर दिए थे
लेकिन चन्द्रशेखर आजाद से अंग्रेज इतने भयभीत थे की उनपर कई सौ गोलिया चलायी फिर जब उन्हें विश्वास हो गया की चन्द्रशेखर आजाद अब मृत है तभी उनके खून से छलनी शरीर के पास गये और इस प्रकार उनके मृत्यु की पुष्टि की गयी और फिर बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर आजाद पार्क कर दिया गया
इस प्रकार उन्हें द्वारा अक्सर कहने वाली ये शायरी सत्य सिद्ध हुई –

दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे
आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही मरेंगे

देश के इस महान देशभक्त का नाम आजादी पाने वाले नवयुवको में चंद्रशेखर आजाद का नाम हमेसा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा और उनके बलिदान को याद करते हुए अक्सर लोग यही कहेगे

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले

वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा”

तो आप सबको चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी Chandra Shekhar Singh Azad Biography कैसा लगा प्लीज हमे कमेंट बॉक्स में जरुर बताये और इस पोस्ट को शेयर भी जरुर करे 

लाल बहादुर शास्त्री जीवनी पर निबन्ध

ईमानदारी एक ऐसा मानवीय गुण है जो बड़े से बड़े विप्पति का सामना भी बड़े धैर्य से कर लेता है जो व्यक्ति सत्य और ईमानदारी की राह चलता है उसे कोई डिगा नही सकता है इसी ईमानदारी और सत्य की राह पर चलने वाले महापुरुषों में हमारे देश के दुसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri का नाम प्रमुखता से लिया जाता है जिनका पूरा जीवन ही ईमानदारी और सादगी की मिशाल पेश करता है
और इसी ईमानदार छवि के लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri को भारत का दूसरा प्रधानमंत्री (Prime Minister)  बनाया गया था इसी महापुरुष के मुख से निकला ओजस्वी नारा “जय जवान जय किसान” पूरे देश को एकता के सूत्र में बाध दिया था और जिनके दृढ संकल्प के चलते विदेशी ताकते भी झुकने को मजबूर हो गयी थी

लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय

लाल बहादुर शास्त्री  (Lal Bahadur Shastri) का जन्म 2 October 1904 को हमारे देश भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मुग़ल सराय जिले के रामनगर में में हुआ था इनके पिता का नाम मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव (Munshi Sharda Prasad Shrivastva) और माता का नाम रामदुलारी देवी था इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक थे जिसके कारण सब लोग इन्हें मुंशी कहते थे बाद में इनके पिता इलाहबाद में भारत के राजस्व विभाग में क्लर्क पद पर काम करने लगे, लाल बहादुर शास्त्री से बड़ी दो बहने थी घर में सबसे छोटा होने के कारण इनके माता पिता प्यार से “नन्हे” बुलाया करते थे
जब लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri लगभग डेढ़ साल के हुए तो प्लेग जैसी भयंकर बीमारी फैलने के कारण इनके पिता का निधन हो गया ऐसे समय में परिवार की सारी जिम्मेदारी इनकी माँ के ऊपर आ गया और फिर इनकी माँ अपने बच्चो के साथ अपने मायके मुगलसराय में आ गयी फिर इनका पालन पोषण इनके नाना और मामा के कन्धो पर आ गया इनके मामा उस समय गाजीपुर में क्लर्क पद पर कार्यरत थे और फिर कुछ समय पश्चात इनके नाना का भी निधन हो गया जिसके पश्चात इनका पालन पोषण इनके मामा और मौसा ने उठाया
फिर इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रामनगर में हुई उस समय अच्छे स्कूल न होने के कारण इन्हें पढने के लिए दूर पैदल ही जाना पड़ता था

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की दिलचस्प प्रेरक प्रसंग

Lal Bahadur Shastri Prerak Prasang Kahani in Hindi

जब लाल बहादुर शास्त्री 6 वर्ष के थे तब ये अपने दोस्तों के साथ पैदल ही रोज स्कूल जाते थे एक दिन की बात है जब स्कूल से घर वापस लौटते थे तब रास्ते में एक आम का बगीचा पड़ता था लाल बहादुर शास्त्री और इनके सभी दोस्त आम के बगीचे में घुसकर आम तोड़ने लगे इसी बीच अचानक बाग़ का माली आ गया सभी दोस्त तो दूर भग गये लेकिन लाल बहादुर शास्त्री सबसे छोटे थे पकड़े और फिर माली ने इनको पकड़ कर पीटना चाहा
तो लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri बोले “मै सबसे छोटा और अनाथ हु आप मुझे मत पीटिये” इस पर माली को दया आ गयी और बोला “चूकी तुम्हारे पिता भी नही है तुम्हे तो और अच्छा आचरण सीखना चाहिए और कभी चोरी नही करना चाहिए” इन शब्दों का लाल बहादुर शास्त्री पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा वे अपने दृढ के पक्के पूरे जीवन पर ईमानदारी के राह पर चले कभी इसके बाद उन्होंने कोई झूट या चोरी का सहारा नही लिया जिसके कारण आज भी ईमानदारी के लिए लाल बहादुर शास्त्री को याद किया जाता है

लाल बहादुर शास्त्री का प्रारम्भिक जीवन

Lal Bahadur Shastri Life Details in Hindi

लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri बचपन से ही पढने में तेज थे और मात्र 10 साल की आयु में ही छटवी क्लास पास कर लिया था अपनी प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू पढने के पश्चात आगे की पढाई करने के लिए बनारस चले आये और फिर अपना प्रवेश हरिश्चन्द्र हाईस्कूल में लिया और फिर आगे की पढाई काशी विद्यापीठ से पूरा किया और विद्यापीठ से “शास्त्री” की उपाधि प्राप्त किया और फिर अपने नाम से अपने “श्रीवास्तव” जाति हटाकर जीवन पर्यन्त “शास्त्री” शब्द लगा लिया और इस प्रकार लाल बहादुर को लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri के नाम से जाना जाने लगा
इसके पश्चात सन 1928 में इनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ जिससे उनके 6 संताने हुए जिनमे दो पुत्रिया कुसुम और सुमन नाम है जबकि 4 बेटो के नाम हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक है

लाल बहादुर शास्त्री का क्रांतिकारी जीवन

सन 1921 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर पूरे देश में अंग्रेजो के खिलाफ असहयोग आन्दोलन की शुरुआत हुई तो भारत को आजादी दिलाने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा तब लाल बहादुर शास्त्री भी अपने देश के खातिर घरवालो के मना करने के बावजूद इन्होने अपनी पढाई छोड़ दी और असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े और फिर अंग्रेजो द्वारा इन्हें भी गिरफ्तार कर लिया लेकिन मात्र 17 वर्ष की आयु होने के कारण इन्हें बाद में छोड़ दिया गया फिर आगे चलकर विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त किया था जिसका वर्णन हम पहले ही कर चुके है

फिर इसके पश्चात लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri प्रत्यक्ष रूप से गांधीजी के साथ जुड़ गये और सन 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बढ़चढ़कर भाग लिया और लोगो को एकजुट करने का प्रयास करने लगे जिसके पश्चात फिर अंग्रेजो के द्वारा इन्हें गिरफ्तार कर लिया और फिर उन्हें ढाई साल की जेल की सजा हुई जहा उन्हें जेल में अनेक क्रन्तिकारी समाज सुधारको से इनकी मुलाकात हुई जिनसे लाल बहादुर शास्त्री  काफी प्रभावित हुए
इसी दौरान लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri के बेटी का बहुत ज्यादा तबियत ख़राब हुआ फिर अंग्रेजो ने उनके सामने यह शर्त रखी की वे अपने बेटी से तभी मिल सकते है जब यह लिखकर दे की वे फिर कभी स्वन्त्रन्ता आन्दोलन में भाग नही लेंगे लेकिन बचपन से ही स्वाभिमानी और अपने देश भक्ति के प्रति गहरे लगाव के कारण वे ऐसा कदापि करना उचित नही समझा क्यूकी ऐसा करना वे अपने आत्म सम्मान के विरुद्ध मानते थे और उन्होंने कभी भी अंग्रेजो के सामने घुटने नही टेके.
और फिर आजादी के दौरान मरो या मारो का नारा दिया जो की अंग्रेजी शासन को भागने के लिए काफी था इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri जी गांधीजी के आदर्शो पर चलकर आजादी की लडाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और और आजादी मिलने के बाद सक्रीय रूप से कांग्रेस के नेता बन गये

लाल बहादुर शास्त्री का राजनितिक जीवन

आजादी मिलने के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri भारत के प्रथम कार्यवाहक रेलमंत्री बनाये गये तब इसी दौरान एक भयंकर रेल दुर्घटना हो गयी फिर घटना पर इस पर अपनी इरादे के अटल और दिल से नरम लाल बहादुर शास्त्री ने कहा की “यदि मेरे रेलमंत्री रहते हुए ऐसी कोई भी घटना होती है तो इसके लिए मै स्वय जिम्मेदार हु” इसके पश्चात उन्होंने तुरंत रेलमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया इस निर्णय से पूरा देश लाल बहादुर शास्त्री के समर्थन में उतर पड़ा और यहाँ तक की तत्कालीन प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संसद में लाल बहादुर शास्त्री के फैसले की जमकर तारीफ की और कहा की ऐसे ईमानदार छवि से लोगो में एक नई दिशा की शुरुआत करेगा

सन 1964 में अचानक नेहरु के अचानक निधन के पश्चात इनकी ईमानदार छबि के चलते इन्हें 9 जून 1964 को भारत का दूसरा प्रधानमंत्री (Prime minister) बनाया गया फिर 18 महीने के कार्यकाल में एक प्रधानमंत्री के रूप में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा सन और फिर 1965 में पाकिस्तान द्वारा भारत पर अचानक से हमला कर दिया जिस पर राष्ट्रीय आपदा से निपटने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति ने आपातकाल बैठक बुलाया जिसमे सेना के तीनो सेना अध्यक्ष और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri शामिल हुए
तब सेना के तीनो अध्यक्षों ने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से सवाल किया की “सर इस स्थिति से निपटने के लिए क्या करना चाहिए” तो अदम्य दृढ साहस के प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री ने एक टुक में कहा “ आप देश की रक्षा के लिए को जो करना है करिए आप लोगो के साथ पूरा देश है और हमे बताईये की हमे क्या करना है”
इसके पश्चात तो सेनाओ में जोश भर गया और फिर पाक को भारतीय सेना द्वारा मुहतोड़ जबाव दिया गया जिसकी कल्पना शायद उस समय के पाक राष्ट्रपति अयूब खान ने भी नही की थी और भारतीय सेना अपनी विजयी पताका तो लाहौर तक फहरा दिया था इस युद्द में पाकिस्तान को काफी नुकसान उठाना पड़ा भारतीय सेना द्वारा पाक के 260 टैंक में से 245 टैंक नष्ट कर दिए गये थे
फिर युद्द को रोकने के लिए अमेरिका द्वारा धमकी दिया गया और कहा गया की यदि भारत युद्द नही रोकता है उसे अनाज देना बंद कर दिया जायेगा इस पर स्वाभिमानी प्रधानमंत्री ने एक टुक में अमेरिका को जवाब दिया की “हम एक वक्त खाकर गुजारा कर सकते है लेकिन किसी के आगे झुकने को तैयार नही है”
उस समय हमारे देश में अनाज की काफी किल्लत थी खाने के अनाज हमे विदेशो से मगाना पड़ता था इसी समस्या को समझते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने देश को सम्बोधित करते हुए “जय जवान जय किसान” का नारा दिया जिसके चलते पूरा भारत दिन में सिर्फ एक बार ही खाना खाता था और रविवार के दिन सभी उपवास भी रखने लगे थे लाल बहादुर शास्त्री के इसी नारे ने पूरे देश के जवानों में उर्जा भर दिया था और अब किसान भी खेतो में जाकर जमकर मेहनत करने लगे और लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिया गया नारा अज भी हमारे देश उतना ही प्रसिद्द है जितना उस समय था

पढ़े :- लाल बहादुर शास्त्री के 20 अनमोल विचार | Anmol Vichar

फिर युद्ध को रोकने के लिए पाकिस्तान से रूस और अमेरिका से गुहार लगायी फिर इसके पश्चात लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri थोडा नम्र हुए और उन्होंने इन देशो की बात मान ली और जिस देश की सेनाये जहा थी वही तक रुक गयी और फिर युद्ध का शांतिपूर्ण हल के लिए दोनों देशो के प्रधानमंत्री को रूस ने अपने शहर ताशकंद में बुलाया

लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु

आख़िरकार रूस और अमेरिका के चलते लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ताशकंद गये और फिर इसी शर्त के साथ वे हस्ताक्षर करने को तैयार थे की भारत द्वारा जीती गयी जमीन दुबारा पाकिस्तान को नही दी जायेगी फिर काफी जद्दोजहद के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री जी युद्ध विराम पत्र पर हस्ताक्षर करने को राजी हुए और इसके बाद युद्द रुक गया और फिर कुछ घंटे के पश्चात ही 11 जनवरी 1966 को आधी रात में लाल बहादुर शास्त्री जी रहस्मय परिस्थितियों में मौत हो गयी

और इनकी मृत्यु का वास्तविक स्थिति को पता लगाने के लिए पोस्टमार्टम तक नही हुआ केवल दुनिया में यह खबर फैला दिया की लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri की मौत हार्टअट्टेक से हुआ है जिसका खुलासा आज तक नही हो पाया है लेकिन उनके साथ गयी उनकी ललिता के अनुसार लाल बहादुर शास्त्री को जहर देकर मारा गया है क्यूकी लाल बहादुर शास्त्री के मृत्यु के पश्चात इनका शरीर नीला पड़ गया था और इस प्रकार लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri की मृत्यु कैसे हुई है आजतक रहस्य बना हुआ है
और इस प्रकार ईमानदार के प्रतिक, सादगी से भरे हुए लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri जी हम सब भारतवासियों को छोडकर इस दुनिया से चले गये लेकिन आज भी लोग उनको इसी ईमानदार छवि के चलते लाल बहादुर शास्त्री भारतीय जनमानस में पूजे जाते है और फिर लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri जी को मरनोपरांत 1966 में “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से सीख

भले ही लाल बहादुर शास्त्री | Lal Bahadur Shastri आज हम लोगो के बीच नही है लेकिन उनके द्वारा दिया गया नारा “जय जवान जय किसान” आज भी लोगो को जोश से भर देता है अपने पूरे जिन्दगी सादगी की मिशाल पेश करने वाले लाल बहादुर शास्त्री आज भी लोगो के लिए ईमानदारी की आदर्श की मिशाल पेश करते है
भले ही लाल बहादुर शास्त्री कद काठी के थे लेकिन उनकी दृढ प्रतिज्ञा के चलते पाकिस्तान को मही अपने मुह का करारा खाना पड़ा था कहा जाता है की भारत पाक 1965 युद्द में अमेरिका द्वारा टैंको को भी लाल बहादुर शास्त्री के इसी दृढ प्रतिज्ञा के चलते भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया था जिसके चलते भारतीय सेना ने पाक को धुल चटायी थी
आज के ज़माने में एक तरफ जहा हर तरफ भ्रस्ट्राचार चरम सीमा पर है लेकिन इन सब से परे लाल बहादुर शास्त्री को अपने पद का तनिक भी मोह नही था और रेलमंत्री रहते हुए तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर घटना की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे दिया था जो की आज के लोगो के लिए एक मिशाल है और अपनी इसी ईमानदारी के चलते हुए भारत के महत्वपूर्ण पद प्रधानमंत्री का पद भी मिला जो की अज के ज़माने में ईमानदारी का एक बेशकीमती उदाहरण है